श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस पर आचार्य मृदुल कृष्ण गोस्वामी ने कहा कि निर्धनता और दरिद्रता में बहुत अंतर है

श्रीमति कौशल्या साय, सांसद बृजमोहन अग्रवाल एवं डॉ रामप्रताप सिंह ने किया श्रवण

खरसिया (विकास ज्योति अग्रवाल)।श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस की कथा में आचार्य मृदुल कृष्ण गोस्वामी महाराज ने स्यमन्तक मणि की कथा में सत्य के बारे में बताया कि सत्य को छिपाया जा सकता है लेकिन मिटाया नहीं जा सकता है। सत्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति परेशान हो सकता है परंतु उसको पराजित नहीं किया जा सकता है । साधारण व्यक्ति की क्या कहें भगवान पर भी स्यमन्तक मणि को चुराने का कलंक लगा था। सत्राजित ने अपनी शंका के आधार पर भगवान श्रीकृष्ण पर मणि चोरी करने और प्रसेन की हत्या करने का आरोप लगा दिया । श्रीकृष्ण ने मणि खोजकर सत्राजित को दे दी और खुद का निर्दोष साबित किया । सत्यमेव जयते।

आचार्य ने कथा में बताया कि भगवान श्री कृष्ण ने भौमासुर का संहार करके सोलह हजार एक सौ कन्याओं को उसके बंधन से मुक्त करके उनका वरण किया। ऊषा अनुरुद्ध विवाह की सुंदर कथा का एवं द्विविध नामक वानर का बलराम जी महाराज के द्वारा बध की कथा का विस्तार से वर्णन किया। भीम और जरासंध के युद्ध की और जरासंध के जन्म की कथा का वर्णन किया।

सुदामा चरित्र की कथा में आचार्य ने कहा कि निर्धनता और दरिद्रता में बहुत अंतर है। सुदामा जी निर्धन हो सकते हैं परंतु वे दरिद्र नहीं है। भगवान अपने भक्तों पर कैसे कृपा करते हैं, गरीब और धनवान का भेद उनके द्वारा नहीं किया जाता है यह बात सुदामा चरित्र के प्रसंग से स्पष्ट होती है।

आचार्य जी ने बताया भगवान लोगों के बीच उनकी वित्तीय स्थिति के आधार पर अंतर नहीं करते हैं और वे हमेशा भक्ति को पुरस्कृत करते हैं। इसके द्वारा सिखाया गया एक और नैतिक तथ्य यह है कि जीवन में कभी भी कुछ भी निःशुल्क की आशा न करें; भगवान आपके अच्छे कर्मों के लिए उचित फल प्रदान करेंगे। एक और नीति बदले में किसी वस्तु के लिए भक्ति का व्यापार नहीं करना चाहिए। सुदामा ने श्रीकृष्ण से कुछ नहीं मांगा। दरिद्र होने के पश्चात् भी सुदामा ने श्रीकृष्ण को वह सब कुछ दिया जो उनके पास था (पोहा); बदले में, भगवान ने सुदामा को उनकी आवश्यकता की हर वस्तु दी।

श्रीकृष्ण सच्चे व्यक्तियों को कैसे पुरस्कृत करते हैं, इस बारे में एक सबक भी है। श्रीकृष्ण ने सुदामा को केवल मित्र होने के कारण पुरस्कृत नहीं किया। सुदामा ने अपना सारा समय और प्रयास एक सच्चे व्यक्ति के लिए सांस्कृतिक प्रयासों में लगाया, जिससे समझा जा सकता है कि वह आर्थिक रूप से समृद्ध क्यों नहीं थे। इसमें धर्म की शिक्षा, नैतिक कर्तव्य और समाज में आध्यात्मिकता का प्रसार शामिल था। यह इस प्रयास के लिए है कि कृष्ण सुदामा के परिवार को धन से पुरस्कृत करते हैं ताकि सुदामा उस कार्य को जारी रख सकें। पूरा पंडाल श्रोताओं से भरा हुआ एक स्वर राधे राधे का जय घोष करने लगा,
बांके बिहारी लाल तेरी जय होवें- मेरे बांके बिहारी लाल तेरी जय होवें,सुन बरसाने वाली गुलाम तेरो बनवारी, आज ब्रिज मे होली रे रसिया,लड्डू होली, फूल होली उत्सव के सुंदर भजनों पर श्रोतागण भाव विभोर होकर नृत्य कर रहे थे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *