विभाजित होती दुनिया को जोड़ने में संग्रहालयों की बड़ी भूमिका: अशोक तिवारी

सीवी रमन विश्वविद्यालय के “संजोही” धरोहर झरोखे के परिप्रेक्ष्य में संग्रहालय दिवस का आयोजन

बिलासपुर (वनांचल न्यूज़) । 18 मई 2026 को अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय दिवस के अवसर पर बिलासपुर संभाग में एक नए सांस्कृतिक आयोजन की सार्थक शुरुआत हुई। यह आयोजन किसी शासकीय संग्रहालय में नहीं, बल्कि कोटा स्थित सीवी रमन विश्वविद्यालय में आयोजित किया गया, जहाँ “संजोही” नामक एक छोटे किन्तु अत्यंत महत्त्वपूर्ण धरोहर-झरोखे का विकास किया गया है। यह पहल विश्वविद्यालय की स्थानीय संस्कृति, लोकधरोहर और विरासत संरक्षण के प्रति उसकी संवेदनशीलता, प्रतिबद्धता तथा दूरदृष्टि का परिचायक है।इस अवसर पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय दिवस समारोह में आधारभूत वक्तव्य देते हुए मैंने कहा कि संग्रहालय केवल आकर्षक और मनोरंजक वस्तुओं को देखने-निहारने के स्थल नहीं होते, बल्कि वे ऐसे जीवंत सांस्कृतिक संस्थान हैं जो संस्कृतियों की जीवन्तता, सार्थकता और उपयोगिता को प्रमाणित तथा दिग्दर्शित करते हैं। उनके माध्यम से मानव समाज की मूर्त एवं अमूर्त—दोनों प्रकार की धरोहरों का संरक्षण संभव हो पाता है।इस वर्ष संग्रहालय दिवस का विषय है— “विभाजित होती दुनिया को जोड़ने में संग्रहालयों की भूमिका।” इस संदर्भ में मैंने छत्तीसगढ़ के महान संत गुरु घासीदास के अमर वाक्य “मनखे-मनखे एक समान” का उल्लेख करते हुए कहा कि संग्रहालयों का मूल उद्देश्य भी यही है—मनुष्य में समानता, सह-अस्तित्व और सांस्कृतिक एकता के भाव को विकसित करना। हर व्यक्ति, हर समाज और हर संस्कृति अपने मूल में समान मानवीय संवेदनाओं से निर्मित होती है। यदि किसी कारणवश इन समानताओं को विभाजन, भेदभाव या श्रेष्ठता-बोध के आधार पर तोड़ा जाता है, तो वह न केवल संस्कृति के विनाश का कारण बनता है बल्कि समाज को भी खंडित करता है। संग्रहालय अपनी प्रदर्शनियों, कार्यक्रमों और संवादों के माध्यम से यह सिखाते हैं कि समूची मानवता एक साझा सांस्कृतिक परिवार है और इसी चेतना से विखंडित होती दुनिया को पुनः जोड़ा जा सकता है।कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भारतीय संस्कृति निधि के छत्तीसगढ़ चेप्टर के संयोजक अरविंद मिश्रा ने कहा कि छत्तीसगढ़ मूर्त और अमूर्त धरोहरों की एक अनंत श्रृंखला से समृद्ध प्रदेश है। यहाँ के राजप्रासाद, मंदिर, ऐतिहासिक संरचनाएँ और स्थापत्य परम्पराएँ जहाँ शिल्प, धर्म, ज्ञान और अनुष्ठान की उत्कृष्टता को अभिव्यक्त करती हैं, वहीं सुवा, ददरिया, गौरा, रहस तथा पंडवानी जैसी लोककलाएँ छत्तीसगढ़ की जीवंत सांस्कृतिक आत्मा को हमारे सामने प्रस्तुत करती हैं। उन्होंने कहा कि संग्रहालयों और ऐसे सांस्कृतिक संस्थानों की जिम्मेदारी केवल वस्तुओं को सुरक्षित रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें भावी पीढ़ियों तक उनकी मौलिकता और गरिमा के साथ हस्तांतरित करना भी उतना ही आवश्यक है। हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि पुरखों से प्राप्त यह सांस्कृतिक संपदा नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि संभालकर आगे बढ़ाने के लिए मिली है।इस अवसर पर विचार व्यक्त करते हुए वरिष्ठ अभियंता शेष नारायण शुक्ल ने कहा कि वे इसी मिट्टी की संतान हैं और ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े होने के कारण छत्तीसगढ़ की संस्कृति उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा रही है। छत्तीसगढ़ शासन में मुख्य अभियंता के पद पर रहते हुए सेवा निवृत्त हुए श्री शुक्ल ने कहा कि यहाँ की लोकसंस्कृति, लोकाचार और परम्पराओं में जीवन की सहजता, सौंदर्य और मानवीयता के वे सूत्र छिपे हैं, जिनसे मनुष्य स्वयं को और समाज को बेहतर ढंग से समझ सकता है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति हमें गौरव प्रदान करती है और हमारा दायित्व है कि संग्रहालयों तथा अन्य सांस्कृतिक संस्थानों के माध्यम से इसे बिना किसी विकृति, घालमेल या कृत्रिमता के उसके वास्तविक और शुद्ध स्वरूप में संरक्षित रखा जाए।कार्यक्रम का प्रारम्भ करते हुए विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. अरविंद तिवारी ने विश्वविद्यालय में विकसित “संजोही” धरोहर-झरोखे का परिचय दिया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में ऐसा कोई विभाग नहीं है जिसकी शैक्षणिक आवश्यकता के अंतर्गत संग्रहालय की स्थापना अपेक्षित हो, किन्तु स्थानीय संस्कृति और धरोहर के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के कारण विश्वविद्यालय ने इस पहल को मूर्त रूप दिया है। “संजोही” में बिलासपुर तथा आसपास के ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों से प्राप्त भौतिक संस्कृति के दुर्लभ नमूनों को उनके वास्तविक संदर्भों सहित प्रदर्शित करने का प्रयास किया गया है।उन्होंने संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि इस छोटे से प्रयास को देखने आने वाले सभी लोग इसकी अत्यंत सराहना करते हैं और यही प्रोत्साहन विश्वविद्यालय को अपने कार्य का विस्तार करने के लिए प्रेरित कर रहा है। इसी प्रेरणा से विश्वविद्यालय परिसर में बैगा जनजाति के पारंपरिक आवास-संकुल की स्थापना भी की गई है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि भविष्य में “संजोही” का विस्तार कर छत्तीसगढ़ की समग्र संस्कृति और लोकधरोहर को और अधिक व्यापक आयामों में प्रस्तुत किया जा सकेगा।कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो प्रदीप घोष ने कहा कि यह विश्वविद्यालय के लिए सुखद संजोग है कि विश्वविद्यालय में एक संग्रहालय की स्थापना की गई है जिसे भविष्य में और वृहद रूप देने की कोशिश की जाएगी ताकि वह राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक प्रतिमानों को दर्शकों तक पहुँचा सके और साथ ही उनके संरक्षण और लोकप्रियकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सके ।यह आयोजन केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह इस बात का सशक्त संकेत भी था कि अब उच्च शिक्षण संस्थान भी स्थानीय संस्कृति, लोकस्मृति और विरासत संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय भागीदारी निभाने लगे हैं। “संजोही” जैसी पहलें यह प्रमाणित करती हैं कि यदि संवेदनशीलता और सांस्कृतिक दृष्टि हो, तो छोटे प्रयास भी भविष्य में बड़े सांस्कृतिक अभियानों का आधार बन सकते हैं।

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