‘पितृ तृप्ति से ही देव तृप्त होते हैं और परिवार में कल्याण होता है’ :- पंडित विकास मिश्रा

00 आज से शुरू हो रहा पितृ पक्ष, जानें परंपरा और महत्व

रायपुर (वनांचल न्यूज़) | सनातन धर्म में पितृ पक्ष को अत्यंत पवित्र और विशेष महत्व का समय माना जाता है। इस वर्ष पितृ पक्ष 7 सितंबर से आरंभ होकर 21 सितंबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ सम्पन्न होगा। इस दौरान अपने पूर्वजों को तर्पण और श्राद्ध अर्पित कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करने की परंपरा निभाई जाती है।

भागवताचार्य पंडित विकास मिश्रा ने बताया कि “पितरों की तृप्ति से देव प्रसन्न होते हैं और परिवार में सुख-समृद्धि आती है। इसी कारण श्राद्ध और तर्पण को सनातन परंपरा में विशेष महत्व दिया गया है।”

तर्पण की विधि और दिशा

00 देवताओं को – पूर्व दिशा में जल अर्पित करें।

00 ऋषियों को – उत्तर दिशा में जल अर्पित करें।00पितरों को – दक्षिण दिशा में तर्पण करें।

सुबह सूर्योदय के बाद स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें, कुशा अंगूठे में धारण कर ‘ॐ पितृभ्यः स्वधा’ मंत्र के साथ तिल, जल, चावल और कुशा से तर्पण करें। तर्पण के बाद ब्राह्मण, गौ और असहायों को भोजन कराना एवं दान करना श्रेष्ठ माना गया है।

पितरों को जल अर्पण क्यों आवश्यक?धर्मशास्त्रों के अनुसार जल को जीवन का आधार और सबसे पवित्र तत्व माना गया है। पंडित मिश्रा के अनुसार, जल अर्पण से पितरों की आत्मा तृप्त होती है और वे वंशजों को सुख-शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। पितरों की प्रसन्नता से देव और ऋषि भी संतुष्ट होते हैं।

तिथि अनुसार श्राद्ध

00 प्रतिपदा से चतुर्दशी तक – मृत्यु तिथि पर श्राद्ध किया जाता है।

00 अमावस्या (21 सितंबर – सर्वपितृ अमावस्या) – जब मृत्यु तिथि ज्ञात न हो या सभी पितरों का सामूहिक श्राद्ध करना हो।

00 एकादशी व द्वादशी – ब्रह्मचारी, संन्यासी या अकाल मृत्यु वालों का श्राद्ध।

00 चतुर्दशी – जिनकी मृत्यु हिंसा, युद्ध या दुर्घटना से हुई हो।

यदि किसी को पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, तो सर्वपितृ अमावस्या का दिन उनके श्राद्ध के लिए सर्वोत्तम माना गया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *